BIHAR-ARWAL-कुर्था के जदयू विधायक सत्यदेव कुशवाहा को जातीवादी संकीर्णता से भरे निर्लज्जता कहां दबा कर दिए माननीय विधायक सत्यदेव कुशवाहा जी ।करपी प्रखंड के एक गांव में ग्रामीणों के बीच विधायक एक वायरल वीडियो में कहते सुने जा रहें है कि हम यादव के गांव में किसी के मरने पर भी नहीं जाते हैं ।फोन करवा देते हैं ।जायेंगे तो गाड़ी में आग लगा देगा और मारबो करेगा सब ।
आप सभी अवगत हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और लालू प्रसाद यादव जी की पार्टी एक साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी ।कह सकते हैं कि जदयू की घोषणापत्र पर हीं राजद भी चुनाव लड़ा था ।इसलिए कुर्था विधायक का संवैधानिक पद पर होकर घोर जातीय संकीर्णता से भरी बयानबाजी के लिए ,यादवों को बदनाम करने की षड्यंत्रकारी सोच से यादव मतदाता आहत हुए हैं ।
इसबार रंग बदलने वाले समाजवादी से संघी बने मनुवादी नीतीश कुमार और बेगैरत ,नकारा विधायक सत्यदेव कुशवाहा को भी शहीद जगदेव प्रसाद के धरती पर जनता सबक सिखायेगी । ऐतिहासिक कुर्था के प्रथम समाजवादी विधायक दिवंगत रामचरण सिंह यादव जी ने शहीद जगदेव प्रसाद के लिए अपनी सीट छोड़कर यादवों की सामाज के लिए त्याग का मिसाल भी कायम कर गयें हैं .
उसी त्याग और सहयोग के वारिसों को ये पलटीमार नीतीश कुमार का रंगा सियार विधायक खलनायक साबित करना चाहता है ।अरवल विधानसभा के यादव भी इस मामले में बहुत बड़ा मिसाल कायम करते आयें हैं ।लेकिन यह मिसाल संपूर्ण अरवल विधानसभा के जनता के लिए सहयोगी और हितकारी साबित नहीं हुई है ।मैं जातीय आग्रहों से मुक्त हूँ , के बावजूद बिहारी समाज में, संसदीय राजनीति में जाति सबसे ज्यादा प्रभावित करनेवाला सच्च रहा है ।
लेकिन कुर्था विधायक सत्यदेव कुशवाहा के द्वारा यादवों पर किये गए टिप्पणी का जवाब देना लाजिमी है । कोई विधायक /प्रतिनिधि किसी जाति के वोट से या ब्यक्ति के वोट से विधायक बना हो या ना बना हो फिर भी उनके यहां लोगों के मरने पर भी न जाने का निहायत नीच अलगाववादी,उपेक्षित ,घ्रणित बयान के साथ मजाक उड़ा रहें हैं ।कहते जरा भी लज्जाते नहीं हैं ।
यहां तक यादवों को उपद्रवी बताते-।कहते हैं यादवों के गांव में इसलिए नहीं जाते हैं कि गाड़ी में आग लगा देगा ..?आज जब दोहरे चरित्र वाला विधायक आपकी वफादारी को भी गाली दे रहा है ।इसके कारणों को आप अपने निर्णयों में तलाशेंगे तो सामाजिक राजनीतिक चेतना में शायद समृद्धि हो ।दरबार से थोपे गए नेता और उम्मीदवार को आँख मुँद कर अपनी पूरी ताकत लगाकर विधानसभा पहुंचाते हैं ।
उम्मीदवार का आपके साथ संबंधों का आधार महज यह होता है कि सुप्रीमो घोषणा कर दियें ,और आपकी मजबूरी है कि उसी नालायक और मतलबपरस्त को मतदान करना है ।यह कैसी मजबूरी है ।यह आलम सिर्फ कुर्था विधानसभा का नहीं है बल्कि अरवल विधानसभा का भी वास्तविक हस्र यही है । उम्मीदवार चुनना समझदारी नहीं है ।समझदारी और विवेक का मतलब तब है ,जब अरवल -कुर्था के जनमानस अपने वास्तविक दर्दमंद को अपनी ताकत से अपना प्रतिनिधि चुनकर भेंजें ।
बार,बार ठगे जानेवाले अरवल के लोग अपनी राजनीतिक बुद्धिमता पर आत्मसमीक्षा जरूर करेंगे ।अरवल का तो और भी बुरा हाल है यहां तो अरवल के मिट्टी में राजनीतिक रुप से चेतनशील और जुझारू संघर्षकर्ता तो पैदा होता हीं नहीं कि अरवल की अवाज विधानसभा में बन सके ।कभी बीस साल पटना के पड़ोसी तो कभी दस साल औरंगाबाद के पड़ोसी के हाथ में थमाते रहें है ।
Arwal से आज़ाद खान की रिपोर्ट