2021/02/15

समस्तीपुर से बड़ी खबर : बहेड़ी-शिवाजीनगर-रुसेराघाट भाया मझौल-बरौनी 65 किमी नई रेल लाइन बनेगी...दी हरी झंडी


SAMASTIPUR
: रेल विकास की इच्छा रखने वाले लोगों को लिए अच्छी खबर है। रेलवे बोर्ड ने लोगाें की यातायात व्यवस्था को और सुगम बनाने के लिए बहेड़ी- शिवाजीनगर- रूसेराघाट भाया मझौल-बरौनी 65 किलोमीटर नई रेल लाइन बनाने के लिए क्षेत्र में डोह सर्वे की मंजूरी दी है। इस रेलवे लाइन के निर्माण से बाढ़ आदि के कारण अति पिछड़े इस इलाके में विकास द्वारा खुलेंगे। यातायात सुगम होने पर इलाके के किसान बड़े शहर में अपना अनाज ले जाकर बेच सकेंगे।

रेलवे मंत्रालय ने डोह सर्वे कार्य के लिए रेलवे की कंसल्टेंट कंपनी ईलाट रूड़की को जिम्मेवारी सौपी है। सब ठीक ठाक रहा है तो अगले वित्तीय वर्ष 2021-22 में इस इलाके में सर्वे का कार्य शुरू हो जाएगा। डोह सर्वे करने वाली कंपनी के इंजीनियर सोनू कुमार बताते हैं कि वह इस इलाके में दो दर्जन प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे हैं। बहेड़ी-शिवाजीनगर-रूसेराघाट भाया मझौल-बरौनी नई रेल लाइन का सर्वे कार्य भी मिला है।

जल्द इस योजना पर भी कार्य शुरू किया जाएगा। 65 किलोमीटर के इस नये प्रोजक्ट के पूरा होने से तीन जिले की लाखों आबादी को लाभ मिलेगा। दरभंगा के बहेड़ी यह लाइन सकरी- कुशेश्वरस्थान नई निर्माणाधीन लाइन से जुड़ेगी। इससे दरभंगा के अलावा समस्तीपुर व बेगूसराय के लोगों को लाभ मिलेगा। जिसे इलाके से नई रेल लाइन गुजरेगी वहां पूर्व से रेल लाइन नहीं है। जिससे इस क्षेत्र के लोगों को सड़क मार्ग का उपयोग करना होता है। बाढ़ के दिनों में लोगों को परेशानी होती है।

इस इलाके में अभी मुक्तापुर-लोहनारोड 95 किलोमीटर नई रेल लाइन का सर्वे कार्य अंतिम चरण में चल रहा है। रेलवे की कंसल्टेंस इलाट ने सर्वे का कार्य लगभग पूरा कर लिया है। सिर्फ अर्निंग रिपोर्ट आनी बांकी है। उधर, सकरी- हसनपुर रेल परियोजना पर अभी सकरी से हरनगर तक रेलवे लाइन का निर्माण हो चुका है। हरनगर से कुशेश्वर स्थान व कुशेश्वस्थान से हसनपुर तक रेल लाइनों का निर्माण होना शेष है। रेलवे सूत्रो ने बताया कि तीनों योजनाओं के पूरा होने से इलाके की तस्वीर बदल जाएगी।

रेल मार्ग से इलाके के जुड़ने से अति पिछड़ा इलाके के किसान अपने अनाज को मंडियों तक पहुंचा सकेंगे। इसके अलावा दूसरे परदेशों के लिए भी अनाज ट्रेन से सीधा बुक कर पाएंगे जिससे उन्हें अधिक लाभ मिलेगा। रेल मार्ग से नहीं जुड़ने के कारण इलाके के किसानों को अपना अनाज गांव में ही कम दामो पर बेचना पड़ता है। कभी-कभी तो लोगों का अनाज बाढ़ में डूब कर बर्बाद भी हो जाता है।

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